नमस्कार दोस्तों, BhojpuriTrend में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। आज मैं आपसे एक ऐसे विषय पर बात करना चाहती हूँ, जो शायद हममें से बहुत से लोगों के मन में कभी न कभी जरूर आया होगा।
क्या भोजपुरी बोलना कोई कमी है, और क्या बिहार से होना हमारे सम्मान को कम कर देता है? यह सवाल केवल भाषा या किसी एक राज्य से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि हमारी पहचान, सोच और अपनी जड़ों से जुड़े आत्मसम्मान का विषय भी है। मैं खुद भोजपुरी क्षेत्र से जुड़ी हूँ और मेरा पारिवारिक संबंध बिहार से है, इसलिए इस विषय से मेरा भावनात्मक रिश्ता भी काफी गहरा है।
भोजपुरी आज पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और आसपास के कई क्षेत्रों में बोली, सुनी और अलग-अलग अवसरों पर गाई जाती है।प्रवासी भारतीय समुदायों के माध्यम से भोजपुरी और बिहार से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान दुनिया के कई हिस्सों तक भी पहुँची है।इन समुदायों से जुड़े अनेक लोग आज शिक्षा, व्यवसाय, प्रशासन, तकनीक और दूसरे पेशेवर क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं।
मॉरीशस के प्रधानमंत्री भी बिहारी हैं – https://en.wikipedia.org/wiki/Navin_Ramgoolam
फिर भी हमारे सामने एक सवाल बार-बार खड़ा होता है कि कुछ जगहों पर भोजपुरी बोलने वाले या बिहार से आने वाले लोगों को पूर्वाग्रह का सामना क्यों करना पड़ता है? क्या इसकी जिम्मेदारी केवल दूसरे लोगों की सोच पर डाल देना पर्याप्त है?
शायद नहीं। क्योंकि इस सवाल का एक हिस्सा हमें अपने भीतर भी तलाशना होगा।
भोजपुरी या बिहारी लोगों को सम्मान से क्यों नहीं देखा जाता?
मैं आज यहाँ बिहार या भोजपुरी क्षेत्र की उपलब्धियों की लंबी सूची नहीं गिनाना चाहती। हमने बिहार और पूर्वांचल की शिक्षा, संस्कृति, राजनीति, कला, साहित्य और अन्य क्षेत्रों की उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा और सुना है।
इंटरनेट पर भी ऐसे अनेक लेख मिल जाएंगे, जिनमें इस क्षेत्र के सफल लोगों और ऐतिहासिक योगदान की जानकारी दी गई है। लेकिन आज मैं उन लोगों से कुछ अलग सवाल पूछना चाहती हूँ, जो खुद भोजपुरी बोलते हैं या बिहार और पूर्वांचल से जुड़े हुए हैं।
- क्या आपको अपने भोजपुरी या बिहारी होने पर गर्व है?
- क्या आप अपने बच्चों को भोजपुरी बोलना और समझना सिखाते हैं?
- क्या आप अपने परिवार और अपने लोगों से कभी अपनी मातृभाषा में बातचीत करते हैं?
- क्या आपको अपने गाँव जाने और वहाँ के लोगों से मिलने में खुशी होती है?
- क्या आप साल में कम से कम एक-दो बार अपने गाँव या अपने क्षेत्र में जाने की कोशिश करते हैं?
- क्या आप भोजपुरी साहित्य, संगीत, सिनेमा और अपनी लोक संस्कृति को जानने की कोशिश करते हैं?
इन सवालों के जवाब आपको किसी और को नहीं, बल्कि खुद को देने हैं।
अगर हमें अपनी भाषा पर गर्व नहीं होगा, तो दूसरे कैसे करेंगे?
जरा एक पल के लिए अपने मन से पूछिए कि अगर हमें खुद अपनी भाषा, संस्कृति, गाँव और समाज से लगाव नहीं है, तो दूसरे लोगों से सम्मान की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
यह बात किसी दूसरे समुदाय को दोष देने के लिए नहीं कही जा रही है, बल्कि अपने व्यवहार पर ईमानदारी से विचार करने के लिए कही जा रही है। हम अक्सर अपने ही गाँव की कमियाँ बताते हैं, अपने लोगों का मजाक बनाते हैं और अपनी भाषा को पिछड़ा हुआ समझने लगते हैं।
कई बार हम अपने क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था, रोजगार व्यवस्था और सामाजिक परिस्थितियों की आलोचना करते रहते हैं। आलोचना करना गलत नहीं है, क्योंकि कमियों को पहचानना सुधार की पहली सीढ़ी हो सकती है। लेकिन सवाल यह भी होना चाहिए कि हमने अपने क्षेत्र को बेहतर बनाने के लिए खुद क्या योगदान दिया है?
जिस मिट्टी में हमने बचपन बिताया, वहाँ से मिली चीजों को याद करना भी हमारी जिम्मेदारी है। हमने वहीं की मिट्टी में खेला, वहीं का अनाज खाया, वहीं का पानी पिया और अपने परिवार से संस्कार सीखे। फिर पढ़ाई या नौकरी के लिए बड़े शहर चले जाने के बाद उसी जगह को छोटा समझना कहीं न कहीं हमारे अपने अतीत को नकारना है।
अपनी माँ और अपनी मातृभूमि की तुलना एक बार जरूर कीजिए
मुझे कई बार लगता है कि अपनी मातृभूमि को भूल जाना कुछ वैसा ही है, जैसे कोई बच्चा बड़ा होकर अपनी माँ के योगदान को भूल जाए। एक माँ अपने बच्चे को जन्म देती है, उसे पालती है, खिलाती-पिलाती है और जीवन की शुरुआती सीख देती है। बच्चा बड़ा होकर दुनिया में अपनी पहचान बनाता है और कई बार उसे लगता है कि उसकी सफलता में केवल उसका अपना योगदान है।
लेकिन जब वही बच्चा किसी मुश्किल में पड़ता है या चोट लगती है, तो सबसे पहले उसे अपनी माँ की याद आती है। कोरोना महामारी के समय लाखों लोगों ने अपने गाँव और परिवार की अहमियत को बहुत करीब से महसूस किया होगा। मुश्किल समय में अपने लोगों और अपनी जड़ों की याद आना हमें यह समझाता है कि हमारी पहचान केवल हमारी नौकरी या शहर से नहीं बनती।
हमारी पहचान में हमारा परिवार, हमारी भाषा, हमारी संस्कृति और हमारी जन्मभूमि भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
तो इसका समाधान क्या है?
अब तक हमने कई सवाल उठाए हैं, लेकिन केवल समस्याओं की चर्चा करने से बदलाव नहीं आएगा। हमें यह भी सोचना होगा कि अपनी भाषा और क्षेत्र के प्रति सकारात्मक सोच को मजबूत करने के लिए हम व्यक्तिगत स्तर पर क्या कर सकते हैं।
सबसे पहली बात है कि अपनी मातृभूमि, मातृभाषा और संस्कृति के प्रति मन में सम्मान रखें। दूसरी बात यह है कि अपने बच्चों को भी अपनी भाषा और संस्कृति के बारे में सकारात्मक तरीके से बताएं। उन्हें यह महसूस नहीं होना चाहिए कि भोजपुरी बोलना किसी तरह की कमी, शर्म या पिछड़ेपन की निशानी है।
साथ ही बच्चों को दूसरी भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान करना भी सिखाना चाहिए, क्योंकि अपनी संस्कृति से प्रेम का अर्थ दूसरी संस्कृति को छोटा समझना नहीं है।
बिहारी तो भगवान कृष्ण का नाम है इसको लोग गली कैसे दे सकते हैं?
क्या आपने कभी दूसरे राज्यों के लोगों को अपनी भाषा के लिए शर्मिंदा होते देखा है?
आप में से बहुत से लोग अलग-अलग राज्यों और भाषाओं से जुड़े सहकर्मियों के साथ काम करते होंगे। आपने शायद पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम या दूसरी भाषाएँ बोलने वाले लोगों को आपस में बातचीत करते देखा होगा।
अक्सर लोग अपने करीबी मित्रों या सहकर्मियों के साथ अपनी मातृभाषा में सहज होकर बातचीत करते हैं। वे अपनी भाषा, खान-पान, त्योहार और संस्कृति से जुड़ी बातें भी सहजता के साथ साझा करते हैं।
तो फिर हमें अपनी भोजपुरी बोलने में संकोच क्यों होना चाहिए?
ऑफिस में भोजपुरी बोलना गलत नहीं है, लेकिन संवेदनशीलता जरूरी है
अगर आपके ऑफिस में दो या तीन लोग भोजपुरी जानते हैं और आपस में बातचीत कर रहे हैं, तो सामान्य परिस्थितियों में भोजपुरी में बात करना स्वाभाविक है। लेकिन अगर बातचीत में ऐसे लोग भी शामिल हैं जो भोजपुरी नहीं समझते, तो ऐसी भाषा का उपयोग करना बेहतर है जिसे सभी लोग समझ सकें।
यह केवल भोजपुरी के लिए नहीं, बल्कि हर भाषा के लिए सम्मान और Professional Communication का हिस्सा है। इसलिए अपनी मातृभाषा बोलिए, लेकिन सामने वाले की सुविधा और बातचीत के संदर्भ का भी सम्मान कीजिए। आप एक छोटा सा प्रयोग करके देखिए और किसी अपने भोजपुरी बोलने वाले सहकर्मी से सहजता से भोजपुरी में बातचीत शुरू कीजिए।
शायद आपको महसूस होगा कि अपनी भाषा में कुछ मिनट बात करना भी बचपन और घर की कई पुरानी यादों को वापस ले आता है।
अपने ही लोगों को छोटा समझना बंद कीजिए
हमारे समाज में एक और बात पर ध्यान देने की जरूरत है, और वह है काम करने वाले लोगों के प्रति हमारा व्यवहार। कई बार हम कम आय वाले व्यक्ति या छोटे काम करने वाले व्यक्ति को वह सम्मान नहीं देते, जिसका वह वास्तव में हकदार होता है।
मेरे प्यारे दोस्तों, काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि हर ईमानदार काम सम्मान के योग्य होता है। चाहे कोई किसान हो, मजदूर हो, ड्राइवर हो, दुकानदार हो, सफाईकर्मी हो या किसी कंपनी का अधिकारी हो, हर व्यक्ति सम्मान का हकदार है।
किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति या उसके काम के आधार पर उसकी इज्जत तय करना हमारी सोच को कमजोर बनाता है।अगर हम अपने समाज के लोगों का सम्मान करेंगे, तो हमारे बच्चों में भी सम्मान और समानता की बेहतर सोच विकसित होगी।
भोजपुरी गीत, सिनेमा और संस्कृति से दोबारा जुड़िए
अगर आपको समय मिले, तो कभी घर या गाड़ी में अच्छे भोजपुरी गीत सुनने की कोशिश कीजिए। भोजपुरी फिल्मों, लोकगीतों और साहित्य में अपनी मिट्टी, रिश्तों, त्योहारों और ग्रामीण जीवन से जुड़े अनेक विषय मिल सकते हैं। कभी अपने घर में भोजपुरी या बिहार से जुड़े पारंपरिक व्यंजन बनाकर खाइए और परिवार के साथ पुरानी यादें साझा कीजिए।
मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसी छोटी-छोटी चीजें आपको अपने बचपन और अपनी जड़ों के करीब महसूस करा सकती हैं। यह किसी भोजपुरी गीत, फिल्म या कलाकार का Paid Promotion नहीं है, बल्कि अपनी संस्कृति से जुड़े व्यक्तिगत अनुभव और भावनाओं को साझा करने की कोशिश है।
क्या भोजपुरी के सभी गीत अश्लील होते हैं?
भोजपुरी संगीत के बारे में अक्सर कहा जाता है कि इसके ज्यादातर गीत अश्लील होते हैं। यह एक बहुत व्यापक धारणा है, क्योंकि भोजपुरी संगीत की पूरी दुनिया को कुछ लोकप्रिय गीतों के आधार पर समझना उचित नहीं होगा। भोजपुरी में लोकगीत, भक्ति गीत, पारंपरिक गीत, पारिवारिक गीत और सामाजिक विषयों पर आधारित कई रचनाएँ भी मौजूद हैं।
अगर आपको किसी गीत की भाषा या विषय पसंद नहीं है, तो उसे सुनना जरूरी नहीं है। इसके बजाय आप अच्छे और परिवार के साथ सुने जा सकने वाले गीतों को खोजकर उन्हें अधिक महत्व दे सकते हैं।
Demand और Supply का सिद्धांत भोजपुरी मनोरंजन पर भी लागू होता है
हम अक्सर सवाल करते हैं कि अच्छे भोजपुरी गीत ज्यादा क्यों नहीं बनते, लेकिन हमें दर्शक और श्रोता के रूप में अपनी भूमिका भी समझनी चाहिए। मनोरंजन की दुनिया में दर्शकों की पसंद और मांग का असर निर्माताओं और कलाकारों के निर्णयों पर पड़ सकता है।
अगर लोग अच्छे, साफ-सुथरे और अर्थपूर्ण भोजपुरी गीतों को ज्यादा सुनेंगे, साझा करेंगे और समर्थन देंगे, तो ऐसे कंटेंट की मांग मजबूत हो सकती है। इसलिए केवल शिकायत करने के बजाय हमें यह भी तय करना चाहिए कि हम किस प्रकार के गीत और मनोरंजन को अपना समर्थन दे रहे हैं।
जिस तरह की सामग्री को दर्शक लगातार महत्व देते हैं, उसी दिशा में बाजार में अधिक सामग्री बनने की संभावना बढ़ती है।
अपनी भाषा से प्रेम का मतलब दूसरी भाषा से नफरत नहीं है
यह बात समझना बहुत जरूरी है कि भोजपुरी से प्रेम करने का अर्थ हिंदी, अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा का विरोध करना नहीं है। एक व्यक्ति एक साथ भोजपुरी, हिंदी, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं को सीख सकता है और उनका सम्मान भी कर सकता है। भाषाएँ हमारे बीच दीवार नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने का माध्यम बन सकती हैं।
अपनी मातृभाषा को सम्मान देना हमारी पहचान मजबूत करता है, जबकि दूसरी भाषाओं को सीखना हमारे अवसरों का दायरा बढ़ाता है। इसलिए अपने बच्चों को भोजपुरी सिखाइए, लेकिन साथ ही उन्हें हिंदी, अंग्रेजी और दूसरी आवश्यक भाषाएँ सीखने के लिए भी प्रोत्साहित कीजिए।
बदलाव की शुरुआत हमसे होनी चाहिए
अगर हमें लगता है कि भोजपुरी बोलने वाले लोगों के बारे में समाज में कुछ गलत धारणाएँ बनी हुई हैं, तो हमें केवल शिकायत नहीं करनी चाहिए। हमें अपने व्यवहार, अपनी भाषा, अपनी शिक्षा और अपने काम के माध्यम से सकारात्मक पहचान बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दीजिए, उन्हें मेहनत का महत्व समझाइए और साथ ही अपनी संस्कृति से जुड़े रहने की स्वतंत्रता भी दीजिए। अपने गाँव की कमियों को पहचानिए, लेकिन उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी से पूरी तरह पीछे मत हटिए।
अगर हम सक्षम हैं, तो शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, डिजिटल जागरूकता या किसी अन्य क्षेत्र में अपने गाँव के लिए छोटा योगदान जरूर कर सकते हैं।
किसी बड़े बदलाव की शुरुआत हमेशा बड़े काम से नहीं होती, क्योंकि कई बार एक व्यक्ति की छोटी कोशिश भी लंबे समय में बड़ा असर डालती है।
अंत में आपसे एक छोटी सी बात
अगर मेरी किसी बात से आपको बुरा लगा हो या आप मेरी सोच से पूरी तरह सहमत नहीं हैं, तो मैं उसके लिए दिल से क्षमा चाहूँगी। मेरा उद्देश्य किसी राज्य, भाषा, समुदाय या व्यक्ति को नीचा दिखाना नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों के प्रति सकारात्मक सोच पर बातचीत शुरू करना है।
अगर आपको मेरी कोई बात अच्छी लगी हो, तो अपने दोस्तों और परिवार के साथ इस विषय पर बातचीत जरूर कीजिए। शायद हमारी यही छोटी-सी बातचीत किसी ऐसे व्यक्ति को अपनी भाषा और अपनी पहचान पर गर्व करने की प्रेरणा दे सके, जो आज अपनी जड़ों से दूर महसूस कर रहा है।
भोजपुरी बोलिए, दूसरी भाषाएँ भी सीखिए, अपने गाँव को याद रखिए और अपने काम से अपनी पहचान बनाइए।
क्योंकि अपनी भाषा से प्रेम करना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को समझने का एक खूबसूरत तरीका है।
धन्यवाद।