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यदि आपने “गरीब किसान के बेटे से ₹1 करोड़ सालाना कमाने तक: संघर्ष, शिक्षा और सफलता की सच्ची कहानी (भाग 1)“ पढ़ा है, तो आपको याद होगा कि हमने जाना था कैसे उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों में रहने वाले अनेक बच्चों को सफलता पाने के लिए कठिन संघर्षों से गुजरना पड़ता है।
आपने यह भी जाना कि मेरे एक मित्र ने इन्हीं कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने जीवन की दिशा बदल दी। आज उसी प्रेरणादायक यात्रा का अगला अध्याय मैं आपके साथ साझा कर रही हूँ।
इस भाग में हम उनके परिवार, बचपन और उन परिस्थितियों को समझेंगे, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व और सोच को गहराई से प्रभावित किया।
मेरे मित्र का परिचय और उनका परिवार
उनकी निजी पहचान और गोपनीयता का सम्मान करते हुए मैं उनका वास्तविक नाम साझा नहीं कर सकती। इसलिए इस कहानी में मैं उन्हें “सत्य प्रकाश यादव” नाम से संबोधित करूँगी। यदि यह नाम किसी वास्तविक व्यक्ति से मेल खाता है, तो इसे केवल एक संयोग माना जाए।
सत्या का परिवार बहुत साधारण और छोटा था। परिवार में उनके माता-पिता, दो बहनें और स्वयं सत्या थे। वह अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे और एक छोटे किसान परिवार से संबंध रखते थे।
गाँव के अधिकांश बच्चों की तरह उनका बचपन भी जिम्मेदारियों से भरा हुआ था। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें खेतों में हाथ बँटाना, पशुओं की देखभाल करना और परिवार के दैनिक कार्यों में सहयोग देना पड़ता था। यही उनका सामान्य जीवन था।
सत्या के पिता का संघर्ष और परिवार की जिम्मेदारियाँ
सत्या के पिता स्वभाव से थोड़े सख्त और अनुशासनप्रिय थे। छोटी-छोटी बातों पर उनका गुस्सा कभी-कभी परिवार को कठोर लग सकता था, लेकिन इसके पीछे वर्षों का संघर्ष और जिम्मेदारियों का भारी बोझ छिपा था।
सत्या के दादा जी का असमय निधन एक पारिवारिक विवाद के दौरान लगी गंभीर चोटों के कारण हो गया था। उस घटना ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी अचानक सत्या के पिता के कंधों पर डाल दी। कम उम्र में ही उन्हें खेती संभालनी पड़ी। खेतों में मेहनत करने के साथ-साथ उन्होंने भैंसें पालना शुरू किया। दूध और खोया बेचकर किसी तरह पूरे परिवार का पालन-पोषण करते रहे।
आर्थिक कठिनाइयाँ लगातार थीं, लेकिन उन्होंने कभी अपने बच्चों की शिक्षा को बीच में नहीं रुकने दिया। तीनों बच्चों की पढ़ाई सरकारी विद्यालयों में नियमित रूप से चलती रही और उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार परिवार को हर संभव सुविधा देने का प्रयास किया।
पुरानी दुश्मनी जिसने परिवार का चैन छीन लिया
आर्थिक संघर्षों के अलावा सत्या के परिवार को एक और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता था। यह चुनौती थी वर्षों से चली आ रही पारिवारिक दुश्मनी। जिन दयाद (चाचा और चचेरे भाई) के साथ सत्या के दादा जी का विवाद हुआ था, उनके साथ तनाव समय बीतने के बाद भी समाप्त नहीं हुआ। कभी जमीन के छोटे-छोटे विवाद सामने आते, तो कभी जानबूझकर परिवार को मानसिक रूप से परेशान करने की कोशिश की जाती।
कई बार हालात इतने खराब हो जाते कि सत्या के परिवार को खुली धमकियाँ तक सुननी पड़ती थीं। छोटे-छोटे विवाद भी अनावश्यक रूप से बड़े बना दिए जाते और पूरे परिवार को असुरक्षा का वातावरण झेलना पड़ता। एक छोटे बच्चे के लिए यह सब देखना और समझना आसान नहीं होता। बचपन में ऐसी परिस्थितियाँ किसी भी बच्चे के आत्मविश्वास, मानसिक विकास और पढ़ाई पर गहरा प्रभाव छोड़ सकती हैं।
उस समय छोटे परिवार अक्सर कमजोर माने जाते थे
यह घटना लगभग 1990 से 1995 के आसपास की है, जब गाँवों में संयुक्त परिवारों का प्रभाव बहुत अधिक हुआ करता था। उस समय समाज में बड़े परिवार को ही मजबूत माना जाता था और छोटे परिवारों की आवाज अक्सर दबा दी जाती थी।
सत्या के पिता अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। आगे चलकर सत्या भी अपने परिवार के अकेले बेटे बने। लगातार दो पीढ़ियों तक परिवार छोटा ही रहा, जबकि उनके अन्य दयाद (चाचा और चचेरे भाई) के परिवार काफी बड़े थे। दूसरी ओर उनके चाचा और रिश्तेदारों के परिवारों में कई बेटे और पोते थे। समय के साथ उनकी जमीन का बँटवारा हो गया, जबकि सत्या के परिवार के हिस्से की जमीन अपेक्षाकृत अधिक थी।
यही बात कई लोगों को पसंद नहीं आती थी। जमीन को लेकर मन में ईर्ष्या बढ़ती गई और छोटी-छोटी बातों को बहाना बनाकर सत्या के परिवार से विवाद किया जाने लगा। अक्सर उन्हें यह कहकर डराने की कोशिश की जाती थी कि “हम लोग संख्या में ज्यादा हैं, तुम अकेले हमारा क्या कर लोगे?” उस दौर में गाँवों में एक कहावत बहुत प्रचलित थी—
“जिसकी लाठी, उसकी भैंस।”
दुर्भाग्य से कई बार यही कहावत वास्तविक जीवन में भी सच साबित होती दिखाई देती थी। गाँव की राजनीति भी इस स्थिति को और कठिन बना देती थी। पंचायत चुनावों में जहाँ बड़े परिवारों से अधिक वोट मिलते थे, वहीं छोटे परिवारों की समस्याओं को कई बार गंभीरता से नहीं सुना जाता था।
सत्य के परिवार को भी कई अवसरों पर यही महसूस हुआ कि संख्या की ताकत के सामने उनकी आवाज कमजोर पड़ जाती थी।
कठिन परिस्थितियाँ इंसान को तोड़ती भी हैं और गढ़ती भी हैं
बचपन में गरीबी, जिम्मेदारियाँ, पारिवारिक विवाद और असुरक्षा का माहौल किसी भी बच्चे के लिए मानसिक रूप से बहुत कठिन होता है। लेकिन जीवन का यही सच है कि कुछ लोग परिस्थितियों के आगे हार मान लेते हैं, जबकि कुछ लोग उन्हीं कठिनाइयों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं। भोजपुरी में एक सुंदर कहावत है—
“जेकर नाथ भोलेनाथ, उ अनाथ कइसे होई।”
यानी जिसका साथ भगवान देते हैं, उसका रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो, अंततः उसे आगे बढ़ने की शक्ति मिल ही जाती है। शायद नियति सत्या के जीवन में भी कुछ अलग लिख चुकी थी। अभी उनके संघर्ष की असली कहानी शुरू ही हुई थी।
सरकारी स्कूल की पढ़ाई और सादगी भरा बचपन
अब तक आप समझ चुके होंगे कि सत्या का बचपन आर्थिक तंगी, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक संघर्षों के बीच बीता। लेकिन इन सबके बावजूद उनके माता-पिता ने शिक्षा का साथ कभी नहीं छोड़ा।
आज की तरह उस समय हर गाँव में महंगे निजी विद्यालय नहीं हुआ करते थे। अधिकांश परिवार अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाते थे, क्योंकि वहीं अच्छी शिक्षा भी मिल जाती थी और फीस का बोझ भी नहीं होता था। सत्या ने भी अपनी प्रारंभिक शिक्षा से लेकर इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी तरह सरकारी विद्यालयों में और हिंदी माध्यम से की।
आज के बच्चों को शायद यह बात सुनकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने पहली बार अंग्रेज़ी की A, B, C, D कक्षा छह में सीखी थी। वह भी पूरे सत्र की शुरुआत में नहीं, बल्कि वर्ष के अंतिम महीनों में शिक्षक ने बच्चों को अंग्रेज़ी वर्णमाला से परिचित कराया था। आज जब छोटे-छोटे बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेज़ी बोलना सीखने लगते हैं, तब उस दौर की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता बिल्कुल अलग थी।
पढ़ाई से ज्यादा फिल्मों का शौक
सत्या बचपन में पढ़ाई में बहुत तेज़ छात्र नहीं थे। सच कहूँ तो उनका मन किताबों से अधिक खेलकूद और फिल्मों में लगता था। उस समय गाँवों में लगभग हर घर में टेलीविजन नहीं हुआ करता था। केवल कुछ आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के घर ही टीवी होता था। जब उनके घरों में फिल्म या धारावाहिक चलता था, तब आसपास के बच्चे भी उत्सुकता से देखने पहुँच जाते थे।
लेकिन कई बार घर के बड़े लोग बाहरी बच्चों को अंदर बैठकर टीवी देखने नहीं देते थे। उन्हें बाहर जाने के लिए कह दिया जाता था। मैंने भी अपने बचपन में ऐसी परिस्थितियाँ देखी हैं। उस समय मन में जो बेबसी होती थी, उसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना आज भी आसान नहीं लगता।
शायद यही कारण था कि फिल्मों के प्रति सत्या की उत्सुकता धीरे-धीरे एक शौक में बदल गई।
जब स्कूल छोड़कर फिल्म देखने पहुँच जाते थे
सत्या जब आठवीं और नौवीं कक्षा में पहुँचे, तब फिल्मों का आकर्षण उनके लिए और बढ़ गया। कई बार ऐसा भी होता था कि वह स्कूल जाने के बजाय दोस्तों के साथ फिल्म देखने निकल जाते थे। उस समय उन्हें यह एहसास भी नहीं था कि उनका यह छोटा-सा निर्णय आगे चलकर कितनी बड़ी समस्या बन सकता है।
गाँव का माहौल ऐसा था कि कोई भी व्यक्ति उन्हें रास्ते में देख लेता, तो शाम तक यह खबर उनके घर पहुँच जाती थी। घर लौटने के बाद सबसे पहले उनके पिता को शिकायत सुनने को मिलती और फिर सत्या को अपनी गलती की सज़ा भी भुगतनी पड़ती।
आज यह बात सुनने में साधारण लग सकती है, लेकिन उस समय माता-पिता बच्चों की पढ़ाई को लेकर बेहद गंभीर रहते थे। उन्हें डर रहता था कि यदि बच्चा पढ़ाई से भटक गया, तो उसका भविष्य कठिन हो जाएगा।
गाँव का शिक्षा के प्रति सकारात्मक माहौल
जब भी मैं सत्या से उनके बचपन की बातें करती हूँ, तो वह हमेशा एक बात अवश्य कहते हैं कि उनके गाँव का शैक्षणिक वातावरण वास्तव में अच्छा था। गाँव में ऐसे अनेक विद्यार्थी थे, जो पढ़ाई में बहुत अच्छे थे और अपने परिवार का नाम रोशन कर रहे थे।
समस्या गाँव के माहौल में नहीं थी। असली चुनौती यह थी कि उस समय सत्या स्वयं पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं थे। आस-पड़ोस के माता-पिता अक्सर अपने बच्चों की उपलब्धियाँ बताते और गर्व से कहते कि उनका बेटा कॉलेज में पढ़ रहा है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है या पढ़ाई में हमेशा अच्छे अंक लाता है।
इसके बाद अनजाने में सत्या की तुलना भी उनसे की जाती। कई लोग उनके पिता से कह देते—
“तुम्हारा लड़का तो दिनभर भैंस चराता रहता है। पढ़ाई में इसका मन नहीं लगता। स्कूल की जगह फिल्म देखने चला जाता है। पता नहीं आगे चलकर क्या करेगा।”
ऐसी बातें किसी भी पिता के दिल को गहराई से चोट पहुँचाने के लिए काफी होती हैं।
पिता की नाराज़गी और दयादों (चाचा और चचेरे भाई) की राजनीति
सत्या के पिता अपने बेटे को सफल देखना चाहते थे। जब उन्हें बार-बार ऐसी बातें सुननी पड़ती थीं, तो उनका गुस्सा स्वाभाविक रूप से सत्या पर निकल जाता था। कई बार उन्हें समझाया जाता, डाँटा जाता और कभी-कभी कठोर अनुशासन का भी सामना करना पड़ता।
दुर्भाग्य की बात यह थी कि कुछ दयाद इस स्थिति का फायदा भी उठाते थे। वे जानबूझकर सत्या की छोटी-छोटी गलतियों को बढ़ा-चढ़ाकर उनके पिता तक पहुँचाते थे, ताकि घर का माहौल और अधिक तनावपूर्ण बना रहे। आज जब मैं पीछे मुड़कर इस पूरी घटना को देखती हूँ, तो मुझे लगता है कि यह केवल शिकायतें नहीं थीं। कहीं न कहीं यह परिवार को मानसिक रूप से परेशान रखने की एक सोची-समझी कोशिश भी थी।
लेकिन शायद नियति ने सत्या के लिए कुछ और ही तय कर रखा था। एक पुरानी कहावत है —
“मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंज़ूर-ए-खुदा होता है।”
उस समय किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि जिस लड़के को लोग निकम्मा और आवारा कहकर ताना मारते थे, वही एक दिन अपनी मेहनत और शिक्षा के दम पर दुनिया की अग्रणी सॉफ्टवेयर कंपनी में सम्मानजनक स्थान हासिल करेगा। गरीब किसान के बेटे से ₹1 करोड़ सालाना कमाने तक: संघर्ष, शिक्षा और सफलता की सच्ची कहानी
किसी तरह पूरी हुई हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई
बचपन की शरारतों, पारिवारिक तनाव और पढ़ाई में कम रुचि के बावजूद सत्या ने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी पढ़ाई पर थोड़ा ध्यान देना शुरू किया और मेहनत के साथ आगे बढ़ते रहे। काफी संघर्षों के बाद उन्होंने हाईस्कूल (10वीं) और इंटरमीडिएट (12वीं) की परीक्षा कला वर्ग (Arts Stream) से सफलतापूर्वक पास कर ली।
यह सफलता केवल एक परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं थी। यह उस लड़के की पहली बड़ी उपलब्धि थी, जिसे अक्सर लोग पढ़ाई में कमजोर और भविष्य के लिए अयोग्य समझते थे।
दिलचस्प बात यह थी कि परिवार और रिश्तेदारी में कई ऐसे लड़के थे, जो दसवीं भी पूरी नहीं कर पाए। कुछ ने किसी तरह हाईस्कूल पास कर लिया, लेकिन इंटरमीडिएट तक पहुँचने से पहले ही पढ़ाई छोड़ दी। यहीं से पहली बार सत्या को यह महसूस होने लगा कि यदि लगातार प्रयास किया जाए, तो साधारण शुरुआत भी अच्छे भविष्य की ओर ले जा सकती है।
अब सामने था सबसे बड़ा सवाल—आगे क्या?
बारहवीं की पढ़ाई पूरी होने के बाद परिवार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था कि अब आगे क्या किया जाए। आज की तरह उस समय हर कस्बे और शहर में डिग्री कॉलेज नहीं हुआ करते थे। गाँव के अधिकांश छात्रों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना आसान नहीं था।
उस समय गाज़ीपुर जिले में मुख्य रूप से दो प्रमुख कॉलेज ही छात्रों की पहली पसंद हुआ करते थे।
इन दोनों कॉलेजों में प्रवेश मिलना गाँव के विद्यार्थियों के लिए बड़े अवसर के समान माना जाता था। लेकिन सत्या के सामने समस्या केवल कॉलेज चुनने की नहीं थी। असली चुनौती थी परिवार की आर्थिक स्थिति और समाज की सोच।
दयादों (चाचा और चचेरे भाई) ने आगे पढ़ने से क्यों रोका?
जब सत्या के कॉलेज जाने की चर्चा शुरू हुई, तब कई पड़ोसी और रिश्तेदार उनके पिता को अलग-अलग सलाह देने लगे।
कुछ लोग कहते— “अब इसे और पढ़ाने से क्या फायदा? इसे कहीं काम पर भेज दो। कुछ कमाएगा तो घर की मदद करेगा। पढ़ाई में इसका मन भी नहीं लगता, आगे जाकर क्या करेगा?”
ऐसी बातें बार-बार सुनने के बाद किसी भी पिता का मन डगमगा सकता था। गाँवों में उस समय एक सोच बहुत आम थी कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों को जल्दी कमाने लगना चाहिए। उच्च शिक्षा को कई लोग अनावश्यक खर्च मानते थे।
लेकिन हर परिवार में एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो परिस्थितियों से बड़ा सोचने का साहस रखता है। सत्या के जीवन में वह व्यक्ति उनके पिता थे।
सत्या के पिता का एक फैसला जिसने पूरी जिंदगी बदल दी
सत्या के पिता भले ही स्वभाव से सख्त थे, लेकिन शिक्षा की शक्ति को अच्छी तरह समझते थे। खेती और पशुपालन के काम के कारण उनका रोज़ बाजार आना-जाना होता था। वहाँ उनकी मुलाकात अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से होती रहती थी।
इन्हीं अनुभवों ने उनकी सोच को गाँव के कई लोगों से अलग बना दिया था। उन्होंने यह समझ लिया था कि यदि बेटे को अच्छा अवसर नहीं दिया गया, तो शायद उसका पूरा जीवन सीमित दायरे में ही बीत जाएगा। काफी विचार करने के बाद उन्होंने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा— “मेरा बेटा आगे पढ़ेगा और कॉलेज जरूर जाएगा।”
यह फैसला केवल सत्या के लिए नहीं था। यह उस सोच के खिलाफ भी था, जो गरीबी को बच्चों के सपनों की अंतिम सीमा मानती थी।
सत्या के मन में भी एक नया सपना जन्म लेने लगा
सत्या भी अब पहले जैसे नहीं रहे थे। उम्र के साथ उनमें जिम्मेदारी की भावना बढ़ने लगी थी। वह अपने पिता की डाँट से बचने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में कुछ अलग करने के लिए भी घर से बाहर निकलना चाहते थे।
उन्हें महसूस होने लगा था कि यदि गाँव से बाहर निकलकर नई दुनिया देखी जाए, तो शायद जीवन की दिशा बदल सकती है। उन्हें यह नहीं पता था कि आगे क्या होगा, लेकिन इतना विश्वास जरूर था कि कॉलेज का सफर उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
आज पीछे मुड़कर देखने पर ऐसा लगता है कि मानो नियति उन्हें धीरे-धीरे उसी रास्ते पर ले जा रही थी, जहाँ उनका वास्तविक संघर्ष और असली सफलता उनका इंतजार कर रही थी।
हर बड़ी सफलता की शुरुआत एक छोटे फैसले से होती है
हम अक्सर किसी व्यक्ति की मंजिल देखते हैं, लेकिन उस मंजिल तक पहुँचने के लिए लिए गए छोटे-छोटे फैसलों पर ध्यान नहीं देते। यदि उस दिन सत्या के पिता समाज की बातों में आ जाते और उन्हें पढ़ाई छोड़कर काम पर भेज देते, तो शायद यह पूरी कहानी कभी लिखी ही नहीं जाती।
यही कारण है कि मैं हमेशा मानती हूँ कि माता-पिता का एक सही निर्णय बच्चों का पूरा भविष्य बदल सकता है।
अब शुरू होगा जिंदगी का सबसे यादगार सफर…
गाँव का लड़का अब पहली बार कॉलेज की दुनिया में कदम रखने वाला था। यहीं उसे नए दोस्त मिलेंगे। यहीं पहली बार उसे अपने गाँव से बाहर की दुनिया देखने का अवसर मिलेगा।
यहीं उसके जीवन में कुछ ऐसे अनुभव आएँगे, जो आगे चलकर उसकी सोच, व्यक्तित्व और करियर—तीनों को पूरी तरह बदल देंगे। और हाँ… इसी कॉलेज जीवन में कुछ ऐसी दिलचस्प घटनाएँ भी हुईं, जिन्हें याद करके आज भी सत्या मुस्कुरा देते हैं।
लेकिन उनकी कहानी केवल दोस्ती या युवावस्था तक सीमित नहीं है। यही वह दौर था, जहाँ से उनके करियर की असली नींव रखी जाने लगी।
अगले भाग में क्या पढ़ेंगे?
“गरीब किसान के बेटे से ₹1 करोड़ सालाना कमाने तक: संघर्ष, शिक्षा और सफलता की सच्ची कहानी (भाग 3)” में आप जानेंगे—
- गाज़ीपुर कॉलेज में सत्या का पहला दिन कैसा रहा?
- गाँव से शहर आने पर उन्हें किन नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
- कॉलेज के दिनों की कुछ यादगार और हल्की-फुल्की घटनाएँ।
- किन लोगों ने उनकी सोच बदल दी?
- और कैसे एक साधारण गाँव का छात्र धीरे-धीरे सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री की ओर बढ़ने लगा?
यह कहानी अब और भी रोचक होने वाली है, क्योंकि यहीं से सत्या की जिंदगी में बदलाव की असली शुरुआत होती है।
धन्यवाद!
यदि आपको यह प्रेरणादायक श्रृंखला पसंद आ रही है, तो इसे अपने परिवार, दोस्तों और विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के साथ जरूर साझा करें, जिन्हें आज अपने सपनों पर विश्वास करने की सबसे अधिक जरूरत है।
गरीब किसान के बेटे से ₹1 करोड़ सालाना कमाने तक: संघर्ष, शिक्षा और सफलता की सच्ची कहानी (भाग 1)
(क्रमशः… भाग 3 में जारी)