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यदि आपने “गरीब किसान के बेटे से ₹1 करोड़ सालाना कमाने तक: संघर्ष, शिक्षा और सफलता की सच्ची कहानी (भाग 1)“ पढ़ा है, तो आपको याद होगा कि हमने जाना था कैसे उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों में रहने वाले अनेक बच्चों को सफलता पाने के लिए कठिन संघर्षों से गुजरना पड़ता है। “गरीब किसान के बेटे से ₹1 करोड़ सालाना कमाने तक: संघर्ष, शिक्षा और सफलता की सच्ची कहानी (भाग 2)“
यदि आपने इस प्रेरणादायक श्रृंखला के पिछले भाग पढ़े हैं, तो अब तक आप सत्या के बचपन, उनके परिवार, आर्थिक संघर्ष, सरकारी स्कूल की पढ़ाई और कॉलेज तक पहुँचने की कहानी जान चुके हैं।
पिछले भाग में हमने देखा कि कैसे समाज की नकारात्मक सोच, रिश्तेदारों के ताने और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद सत्या के पिता ने अपने बेटे की पढ़ाई नहीं रुकने दी। यही एक निर्णय आगे चलकर उनकी पूरी जिंदगी बदलने वाला साबित हुआ।
लेकिन असली बदलाव अभी बाकी था। कई बार जीवन में कोई छोटी-सी घटना या किसी नए व्यक्ति से हुई मुलाकात हमारी सोच की दिशा बदल देती है। सत्या के जीवन में भी कुछ ऐसा ही होने वाला था।
सत्या के कॉलेज जीवन की शुरुआत और नए सपने
गाज़ीपुर पी.जी. कॉलेज में प्रवेश मिलने के बाद सत्या की जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ। गाँव की सीमित दुनिया से निकलकर अब उन्हें एक ऐसे माहौल में रहने का अवसर मिला, जहाँ अलग-अलग गाँवों और कस्बों से आए विद्यार्थी अपने सपनों को लेकर पढ़ाई कर रहे थे।
सत्या और उनके गाँव के ही एक मित्र जिनोद भाई ने साथ में स्नातक में प्रवेश लिया। दोनों ने इतिहास और अर्थशास्त्र विषयों का चयन किया और कॉलेज का सफर शुरू हो गया।
कॉलेज का माहौल स्कूल से बिल्कुल अलग था। यहाँ पढ़ाई के साथ स्वतंत्रता भी थी और नए लोगों से मिलने का अवसर भी। हालाँकि सत्या को यह नई जिंदगी अच्छी लगने लगी थी, लेकिन पहली बार घर से दूर रहने का दर्द भी उनके भीतर था।
वह अक्सर अपनी माँ को याद करते थे। उनकी माँ ने बचपन से उन्हें बहुत स्नेह और अपनापन दिया था। घर के अधिकांश काम वह स्वयं कर लेती थीं ताकि बेटे को केवल पढ़ाई पर ध्यान देना पड़े। माँ का यही प्यार सत्या के लिए सबसे बड़ी ताकत था।
कॉलेज की यादें आज भी मुस्कान दे जाती हैं
हर विद्यार्थी की तरह सत्या की कॉलेज लाइफ में भी अनेक मजेदार और यादगार घटनाएँ हुईं। कुछ घटनाएँ इतनी रोचक थीं कि आज भी उन्हें याद करके उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। हालाँकि यदि मैं हर घटना विस्तार से लिखूँ, तो यह कहानी बहुत लंबी हो जाएगी। इसलिए मैं केवल वही अनुभव साझा करूँगी, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व और भविष्य को नई दिशा दी।
हमारी पहली मुलाकात कैसे हुई?
अब मैं आपको बताती हूँ कि मेरी और सत्या की पहली मुलाकात कैसे हुई। उस समय सत्या स्नातक के अंतिम वर्ष में थे और मैंने गाज़ीपुर पी.जी. कॉलेज में बी.एससी. (गणित) में प्रवेश लिया था।
कॉलेज शुरू होने के बाद सबसे बड़ी समस्या रहने के लिए कमरा ढूँढ़ने की थी। कई दिनों तक तलाश करने के बाद संयोग से मुझे वही मकान मिल गया, जहाँ पहले से सत्या और जिनोद भाई किराए पर रहते थे। वह मकान पुलिस लाइन के पास स्थित था और उसके मालिक पेशे से लेखपाल थे। उन्होंने विद्यार्थियों के लिए चार-पाँच कमरे किराए पर दे रखे थे।
मैंने भी वहीं एक कमरा ले लिया। शुरुआत में केवल सामान्य परिचय था, लेकिन धीरे-धीरे बातचीत बढ़ी और फिर हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। कुछ समय बाद हमने एक दूसरा कमरा किराए पर ले लिया, जो पहले वाले मकान से थोड़ी ही दूरी पर था। यहीं से हमारी दोस्ती और गहरी होती चली गई।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि शायद यह मुलाकात भी नियति की योजना का एक हिस्सा थी।
जब पहली बार कंप्यूटर ने सत्या की जिंदगी में दस्तक दी
स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही कॉलेज परिसर में कंप्यूटर शिक्षा का एक विशेष विभाग संचालित होता था, जहाँ विद्यार्थियों को विभिन्न कंप्यूटर कोर्स कराए जाते थे। उस समय पूरे देश में कंप्यूटर शिक्षा तेजी से लोकप्रिय हो रही थी। लोग समझने लगे थे कि आने वाले समय में तकनीकी ज्ञान रोजगार के नए अवसर खोल सकता है।
इसी सोच के साथ सत्या ने डी.सी.ए. (Diploma in Computer Applications) में प्रवेश ले लिया। शायद उस समय उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि यह छोटा-सा निर्णय उनके पूरे जीवन की दिशा बदल देगा। कभी-कभी जिंदगी हमें बिना बताए सही रास्ते पर ले जाती है। सत्या के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
जब शिक्षकों ने पहचानी उनकी असली प्रतिभा
डी.सी.ए. की कक्षाएँ शुरू होने के कुछ ही सप्ताह बाद शिक्षकों ने एक बात पर विशेष ध्यान दिया। सत्या कंप्यूटर से जुड़े हर विषय को बड़ी उत्सुकता और तेजी से सीख रहे थे। चाहे थ्योरी की कक्षा हो या प्रैक्टिकल लैब, उनकी समझ और सीखने की गति अन्य विद्यार्थियों से अलग दिखाई देने लगी।
टेस्ट और प्रैक्टिकल परीक्षाओं में उनके अंक लगातार बेहतर आने लगे। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि जिन विषयों में उन्हें स्नातक के दौरान सामान्य अंक मिलते थे, उन्हीं दिनों कंप्यूटर की पढ़ाई में वह अपनी कक्षा के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में शामिल होने लगे।
यह बदलाव केवल अंकों का नहीं था। यह पहली बार था जब सत्या को महसूस हुआ कि शायद उनकी वास्तविक रुचि किसी और क्षेत्र में है। जब किसी इंसान को अपने काम की सराहना मिलने लगती है, तो उसका आत्मविश्वास अपने आप बढ़ने लगता है। सत्या के साथ भी बिल्कुल यही हुआ। धीरे-धीरे कंप्यूटर केवल एक कोर्स नहीं रहा, बल्कि उनका जुनून बनता चला गया।
उन्हें हर दिन कुछ नया सीखने में आनंद आने लगा और भविष्य पहली बार पहले से अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा।
जिंदगी अब एक नए मोड़ पर थी…
कंप्यूटर की दुनिया ने सत्या के भीतर आत्मविश्वास की एक नई रोशनी जगा दी थी। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि शायद यही वह रास्ता है, जहाँ उनकी मेहनत उन्हें अलग पहचान दिला सकती है। लेकिन सफलता अभी भी बहुत दूर थी। आगे अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई, कठिन प्रतियोगी परीक्षाएँ, आर्थिक संघर्ष और जीवन की कई नई चुनौतियाँ उनका इंतजार कर रही थीं।
डी.सी.ए. (Diploma in Computer Applications) में प्रवेश लेने के बाद सत्या का अधिकांश समय अब कंप्यूटर लैब और किताबों के बीच बीतने लगा था। कॉलेज के दूसरे विषयों की तुलना में उनका मन कंप्यूटर की पढ़ाई में कहीं अधिक लगने लगा। उन्हें हर नया विषय समझने में आनंद आता था और नई तकनीकों के बारे में जानने की उत्सुकता लगातार बढ़ती जा रही थी।
उस समय गाँव के बहुत कम छात्रों को यह समझ थी कि आने वाले वर्षों में कंप्यूटर शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण होने वाली है। अधिकांश लोग इसे केवल एक अतिरिक्त कोर्स मानते थे, लेकिन सत्या इसे अपने भविष्य का रास्ता बनाने लगे थे।
शिक्षकों ने पहचानी उनकी अलग पहचान
कुछ ही महीनों में डी.सी.ए. के शिक्षकों ने एक खास बात महसूस की। जहाँ कई विद्यार्थी केवल परीक्षा पास करने के उद्देश्य से पढ़ते थे, वहीं सत्या हर विषय को गहराई से समझने की कोशिश करते थे। यदि कोई नया प्रोग्राम या तकनीकी अवधारणा पढ़ाई जाती, तो वह कक्षा समाप्त होने के बाद भी उसके बारे में सवाल पूछते रहते।
प्रैक्टिकल लैब में उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया। धीरे-धीरे शिक्षक भी उन्हें दूसरे विद्यार्थियों के लिए उदाहरण के रूप में देखने लगे। परीक्षाओं में उनके अंक लगातार अच्छे आने लगे। कई बार वह पूरी कक्षा के शीर्ष तीन विद्यार्थियों में शामिल रहते और कुछ परीक्षाओं में प्रथम स्थान भी प्राप्त करते।
यह बात स्वयं सत्या के लिए भी आश्चर्यजनक थी। स्नातक के सामान्य विषयों में जहाँ उन्हें औसत अंक मिलते थे, वहीं कंप्यूटर की पढ़ाई में वह लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे थे। यहीं से उनके भीतर यह विश्वास पैदा हुआ कि शायद भगवान ने उनके लिए यही क्षेत्र चुना है।
आत्मविश्वास की पहली असली शुरुआत
जीवन में ऐसा बहुत कम होता है कि कोई व्यक्ति पहली बार अपनी वास्तविक क्षमता को पहचान पाए। सत्या के लिए यह वही समय था। जब किसी विद्यार्थी को लगातार अपने शिक्षकों का प्रोत्साहन मिलता है, अच्छे अंक प्राप्त होते हैं और मेहनत का परिणाम दिखाई देने लगता है, तब उसका आत्मविश्वास अपने आप बढ़ जाता है।
अब वह केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं पढ़ते थे। वह सीखने के लिए पढ़ते थे। यही अंतर आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनने वाला था।
स्नातक पूरा हुआ, लेकिन सीखने का सफर नहीं रुका
समय तेजी से आगे बढ़ा और देखते ही देखते सत्या ने अपना स्नातक तथा डी.सी.ए. दोनों सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। उधर मैं अभी अपने स्नातक के दूसरे वर्ष में पढ़ रहा था। इसी दौरान सत्या ने गाज़ीपुर के एक प्रतिष्ठित कंप्यूटर प्रशिक्षण संस्थान UP-TECH में प्रवेश लेने का निर्णय किया।
उन्होंने ‘O’ Level कंप्यूटर कोर्स में दाखिला लिया, जो उस समय सरकार से मान्यता प्राप्त एक प्रतिष्ठित तकनीकी पाठ्यक्रम माना जाता था। उस दौर में आईटी क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा था। ऐसे में ‘O’ Level जैसे कोर्स युवाओं के लिए बेहतर रोजगार की उम्मीद लेकर आते थे। सत्या ने जब मुझे इसके बारे में बताया, तो मैंने भी उनके साथ उसी संस्थान में प्रवेश ले लिया। यहीं से हमारी दोस्ती केवल कमरे तक सीमित नहीं रही, बल्कि पढ़ाई और सपनों की साझेदारी भी बन गई।
हिंदी माध्यम के छात्रों के सामने सबसे बड़ी चुनौती
‘O’ Level की पढ़ाई शुरू होते ही हमें एक नई कठिनाई का सामना करना पड़ा। हम दोनों हिंदी माध्यम से पढ़कर आए थे, जबकि कंप्यूटर की अधिकांश किताबें और तकनीकी शब्द पूरी तरह अंग्रेज़ी में थे। शुरुआत में कई बार ऐसा होता था कि किसी विषय को समझने में अपेक्षा से अधिक समय लग जाता। एक-एक शब्द का अर्थ समझना पड़ता था।
नई तकनीकी शब्दावली याद करनी पड़ती थी। कई बार एक छोटा-सा अध्याय पूरा करने में घंटों लग जाते थे। लेकिन जहाँ अधिकांश विद्यार्थी इस कठिनाई से घबरा जाते, वहीं सत्या ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। वह रोज़ अतिरिक्त समय निकालकर अभ्यास करते। जिस विषय को समझ नहीं पाते, उसे दोबारा पढ़ते।
जरूरत पड़ती, तो शिक्षक से पूछतेऔर यदि फिर भी संतुष्टि नहीं मिलती, तो पुस्तकालय में बैठकर स्वयं उत्तर खोजते। यही आदत आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।
मेहनत का असर अब दिखाई देने लगा था
कुछ ही महीनों बाद पूरे संस्थान में सत्या की पहचान एक मेहनती विद्यार्थी के रूप में बनने लगी। थ्योरी हो या प्रैक्टिकल, दोनों में उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता जा रहा था। कई शिक्षक उन्हें अतिरिक्त प्रश्न हल करने के लिए देते और सत्या मुस्कुराते हुए उन चुनौतियों को स्वीकार कर लेते।
मुझे आज भी याद है कि कई बार पूरी कक्षा किसी कठिन विषय को लेकर उलझ जाती थी। लेकिन सत्या धैर्यपूर्वक उसे समझते, अभ्यास करते और फिर अपने दोस्तों को भी सरल भाषा में समझाने की कोशिश करते। शायद उन्हें स्वयं भी यह एहसास नहीं था कि यही सीखने और दूसरों को सिखाने की आदत भविष्य में उन्हें एक सफल तकनीकी लीडर बनाएगी।
एक नई दोस्ती, जिसने कॉलेज के दिनों को यादगार बना दिया
इसी बैच में एक मेधावी छात्रा भी पढ़ती थीं, जिनका नाम था सुधा मिश्रा। वह पढ़ाई में बेहद होशियार थीं और अपनी मेहनत के कारण शिक्षकों की पसंदीदा विद्यार्थियों में गिनी जाती थीं। कंप्यूटर लैब में प्रोजेक्ट और प्रैक्टिकल के दौरान कई बार विद्यार्थियों के बीच सामान्य बातचीत हो जाती थी।
धीरे-धीरे सत्या और सुधा की भी एक सामान्य मित्रता हो गई। उस दौर का माहौल आज की तरह खुला नहीं था। उस समय यदि किसी लड़के और लड़की को दो-चार बार साथ बात करते हुए देख लिया जाता, तो लोग अपनी तरफ से तरह-तरह की कहानियाँ बना लेते थे।
लेकिन सच यह था कि दोनों की प्राथमिकता केवल पढ़ाई थी। हाँ, यह बात जरूर थी कि सत्या मन ही मन उनकी प्रतिभा और सरल स्वभाव की प्रशंसा करते थे। वह अक्सर मज़ाक में कहते थे— “सुधा सचमुच Beauty with Brain थीं।”
लेकिन यह केवल एक मासूम कॉलेज वाली भावना थी, जिसने उनकी पढ़ाई या लक्ष्य को कभी प्रभावित नहीं किया।
असली परीक्षा अब बाकी थी…
‘O’ Level की पढ़ाई अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी, अब सभी विद्यार्थियों का ध्यान केवल अंतिम परीक्षा पर था। सत्या भी पूरे मन से तैयारी में जुट गए। उन्हें महसूस होने लगा था कि यदि इस परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन हुआ, तो आगे का रास्ता पहले से अधिक मजबूत हो जाएगा।
लेकिन उन्हें यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले कुछ दिनों में उनकी मेहनत ऐसा परिणाम देने वाली है, जो उनके आत्मविश्वास को हमेशा के लिए बदल देगा। अब कहानी उस मोड़ पर पहुँच चुकी है, जहाँ उनकी मेहनत की पहली बड़ी परीक्षा होने वाली थी।
दोस्ती, साइकिल और कॉलेज के सुनहरे दिन
कॉलेज के दिन शायद हर इंसान की जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिनों में गिने जाते हैं। पढ़ाई के साथ दोस्ती, छोटे-छोटे मज़ाक और अनगिनत यादें जीवनभर साथ रहती हैं। उस समय मेरे पास एक साइकिल थी और अक्सर मैं तथा सत्या उसी साइकिल से कंप्यूटर क्लास और कॉलेज जाया करते थे।
रास्ते भर पढ़ाई, भविष्य और सपनों की बातें होती थीं। कभी-कभी हँसी-मजाक इतना बढ़ जाता कि रास्ता कब खत्म हो जाता, पता ही नहीं चलता था। आज भी जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो लगता है कि जिंदगी कितनी सरल और बेफिक्र थी।
एक मासूम कॉलेज वाला किस्सा
हमारी कंप्यूटर क्लास में सुधा मिश्रा नाम की एक होनहार छात्रा भी पढ़ती थीं। वह पढ़ाई में तेज थीं और सभी से विनम्रता से बात करती थीं। एक दिन क्लास खत्म होने के बाद सत्या ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो, आज देखते हैं कि सुधा किस रास्ते से घर जाती हैं।”
उस समय हम भी बिल्कुल सामान्य कॉलेज के लड़कों की तरह छोटी-छोटी बातों में खुशी ढूँढ़ लिया करते थे। हम दोनों साइकिल से कुछ दूरी बनाकर उनके पीछे-पीछे चल पड़े। रास्ते भर हमें लग रहा था कि कहीं वह मुड़कर देख न लें।
लेकिन कुछ ही देर बाद वह एक दूसरी गली में मुड़ गईं और हम दोनों रास्ता ही भूल गए। आखिरकार हँसते हुए वापस लौट आए। कुछ दिनों बाद हमने यह भी देखा कि वह सभी सहपाठियों से उसी सहजता और मुस्कान के साथ बात करती थीं।
तब हमें समझ आया कि उनकी विनम्रता को हम अपनी कल्पना से जोड़ बैठे थे। उस दिन के बाद सत्या ने हँसते हुए कहा, “अब दिल से ज्यादा दिमाग लगाना चाहिए। अभी हमारा असली लक्ष्य पढ़ाई है।”
यह छोटी-सी घटना भले ही मज़ेदार थी, लेकिन उसने उन्हें एक अच्छी सीख भी दी—भावनाएँ अपनी जगह हैं, लेकिन सही समय पर लक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण होता है।
अब पूरी तैयारी थी अंतिम परीक्षा की
समय तेजी से बीतता गया और ‘O’ Level की अंतिम परीक्षा नज़दीक आ गई। पूरे बैच में पढ़ाई का माहौल बन चुका था। कोई नोट्स दोहरा रहा था, कोई पुराने प्रश्नपत्र हल कर रहा था, तो कोई देर रात तक कंप्यूटर लैब में अभ्यास कर रहा था। सत्या भी पूरे समर्पण के साथ तैयारी कर रहे थे।
हालाँकि उन्हें विषय अच्छी तरह समझ आते थे, फिर भी वह हर अध्याय को बार-बार दोहराते थे। उनका मानना था कि आत्मविश्वास तभी आता है, जब तैयारी पूरी हो।
वाराणसी में हुई सबसे कठिन परीक्षा
उस समय ‘O’ Level की परीक्षा देने के लिए हमें वाराणसी जाना पड़ा। हम सभी विद्यार्थी उत्साहित भी थे और थोड़े घबराए हुए भी। जैसे ही प्रश्नपत्र हाथ में आया, मेरे और सत्या दोनों के चेहरे का रंग बदल गया। हमें लगा कि परीक्षा हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन है।
कई प्रश्न ऐसे थे, जिन्हें समझने में ही समय लग गया। परीक्षा समाप्त होने के बाद हम दोनों एक-दूसरे को देखकर यही कह रहे थे,
“शायद इस बार एक-दो पेपर फिर से देने पड़ेंगे।” हमें पूरा विश्वास था कि परिणाम उम्मीद के अनुसार नहीं आएगा। परीक्षा के बाद जब हम संस्थान पहुँचे, तो कई विद्यार्थी मुस्कुराते हुए कह रहे थे, “पेपर तो बहुत आसान था।” यह सुनकर हमारी चिंता और बढ़ गई।
हम सोचने लगे कि शायद केवल हमें ही प्रश्नपत्र कठिन लगा था। कई दिनों तक परिणाम का इंतजार करना हमारे लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था।
परिणाम का दिन, जिसने सब कुछ बदल दिया
आखिर वह दिन भी आ गया, जिसका हम सभी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। सुबह-सुबह हम दोनों संस्थान पहुँचे। कुछ विद्यार्थी पहले ही अपना परिणाम देख चुके थे। कोई खुशी से झूम रहा था, तो कोई एक-दो विषयों में असफल होने के कारण उदास बैठा था।
सत्या भी धीरे-धीरे परिणाम सूची के पास पहुँचे। कुछ पल तक वह चुपचाप अपने अंक देखते रहे। फिर अचानक उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने लगभग सभी विषयों में ‘A’ ग्रेड प्राप्त किया था। सबसे बड़ी खुशी की बात यह थी कि C Programming में उन्हें ‘S’ Grade मिला था, जो उत्कृष्ट प्रदर्शन का प्रतीक माना जाता था।
पूरा संस्थान उन्हें बधाई देने लगा। शिक्षकों के चेहरे पर भी गर्व साफ दिखाई दे रहा था। उस वर्ष सत्या ने अपने संस्थान में सबसे अधिक अंक प्राप्त किए थे। यह केवल परीक्षा में सफलता नहीं थी। यह उस किसान के बेटे की पहली बड़ी तकनीकी उपलब्धि थी, जिसने कभी अंग्रेज़ी वर्णमाला भी देर से सीखी थी।
घरवालों की खुशी देखने लायक थी
जब सत्या ने अपने पिता और परिवार को यह समाचार दिया, तो पूरे घर में खुशी का माहौल बन गया। जिन लोगों ने कभी उनकी पढ़ाई पर सवाल उठाए थे, वही अब उनकी मेहनत की चर्चा करने लगे। सबसे अधिक खुशी उनके पिता को हुई।
उन्हें पहली बार लगा कि उनका बेटा सचमुच सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। सत्या के लिए यह केवल एक रिजल्ट नहीं था। यह उनके पिता के विश्वास और वर्षों के संघर्ष की पहली बड़ी जीत थी।
अब मंजिल और बड़ी हो चुकी थी
‘O’ Level में शानदार सफलता मिलने के बाद सत्या ने एक और बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने तय किया कि अब वह यहीं नहीं रुकेंगे। उनका अगला लक्ष्य था ‘A’ Level कंप्यूटर कोर्स। उस समय यह कोर्स काफी कठिन माना जाता था और इसके लिए अधिक मेहनत, समय तथा गहरी तकनीकी समझ की आवश्यकता होती थी। इसके लिए उन्हें वाराणसी जाकर पढ़ाई करनी थी।
उधर मेरी स्नातक की पढ़ाई का अभी एक वर्ष बाकी था। इस कारण हमारी राहें कुछ समय के लिए अलग होने लगीं। हम दोनों जानते थे कि यह दूरी केवल जगह की थी, सपनों की नहीं।
बिना मोबाइल के भी दोस्ती कायम रही
यह लगभग वर्ष 2002 का समय था। आज की तरह मोबाइल फोन और इंटरनेट हर किसी के पास नहीं होते थे। यदि किसी से बात करनी होती, तो पीसीओ से कॉल करनी पड़ती थी या फिर चिट्ठियों का सहारा लेना पड़ता था। धीरे-धीरे पढ़ाई और नई जिम्मेदारियों के कारण हमारी बातचीत भी कम होने लगी।
हमें बिल्कुल नहीं पता था कि कुछ वर्षों बाद किस्मत हम दोनों को फिर एक नए शहर में मिलाने वाली है।
अगला अध्याय होगा संघर्षों से भरा…
वाराणसी की पढ़ाई पूरी करने के बाद सत्या की जिंदगी उन्हें एक ऐसे शहर ले जाएगी, जहाँ सपने तो बहुत बड़े थे, लेकिन संघर्ष उससे भी बड़े। वह शहर था—दिल्ली। यहीं से शुरू होगी बेरोज़गारी, असफल इंटरव्यू, छोटी नौकरी, फैक्ट्री में काम और जिंदगी की सबसे कठिन परीक्षा। लेकिन शायद भगवान भी उसी की परीक्षा लेते हैं, जो हार मानना नहीं जानता।